पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) के बाल एवं नवजात शिशु सर्जरी विभाग के चिकित्सकों ने चार महीने के मासूम के पेट से 1.5 किलो वजनी ट्यूमर निकालकर सफलतापूर्वक जटिल सर्जरी कर उसे नया जीवन दिया। इस ऑपरेशन की अगुवाई बाल एवं नवजात शिशु सर्जन डॉ. प्रवीण झंवर ने की। प्रतापगढ़ निवासी चार माह का यह बच्चा पिछले करीब 15 दिनों से पेट फूलने और लगातार रोने की समस्या से परेशान था। परिजनों ने पहले स्थानीय चिकित्सकों को दिखाया, लेकिन राहत नहीं मिली। बाद में परिचितों की सलाह पर बच्चे को पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल लाया गया, जहां डॉ. प्रवीण झंवर ने जांच कराई। सीईसीटी एब्डोमेन स्कैन में सामने आया कि बच्चे के पेट में लगभग 15म12 सेंटीमीटर आकार का गैस्ट्रिक ट्यूमर है, जो आमाशय के बड़े हिस्से को घेरे हुए था। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए डॉक्टरों की टीम ने तुरंत ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। इतनी कम उम्र के बच्चे की सर्जरी करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अनुभवी टीम ने पार्शियल गैस्ट्रेक्टोमी प्रक्रिया के माध्यम से आमाशय के आधे हिस्से के साथ ट्यूमर को सफलतापूर्वक निकाल दिया। निकाले गए ट्यूमर को हिस्टोपैथोलॉजिकल जांच के लिए भेजा गया, जिसमें इमैच्योर मेसेंटेरिक टेराटोमा की पुष्टि हुई।
चिकित्सा जगत में तकनीक और अनुभव के मेल ने एक बार फिर एक जटिल मामले को सुलझाकर मरीज को नई जिंदगी दी है। भीलों का बदला स्थित पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में 68 वर्षीय एक बुजुर्ग का सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया गया, जिनके प्रोस्टेट का आकार सामान्य से कई गुना बड़ा यानी 218 ग्राम था। इस सफल ऑपरेशन यूरोलॉजिस्ट एवं रिकंस्ट्रक्शनल सर्जन डॉ. हनुवन्त सिंह राठौड के साथ डॉ. हॉर्दिक पटेल, निश्चेतना विभाग के डॉ. प्रकाश औदिच्य, डॉ. अनिल, डॉ. प्रियांशी, डॉ.गोविन्द, घनश्याम एवं चन्द्रमोहन का योगदान रहा। 68 वर्षीय यह मरीज लंबे समय से पेशाब में रुकावट और पेशाब के साथ खून आने की गंभीर समस्या से पीड़ित था। परिजनों ने पहले अहमदाबाद के बड़े अस्पतालों में परामर्श लिया और वहां ऑपरेशन भी कराया। हालांकि, प्रोस्टेट का आकार अत्यधिक बड़ा होने और सर्जरी के दौरान हो रही भारी ब्लीडिंग के कारण वहां ऑपरेशन सफल नहीं हो सका। निराश होकर परिजन मरीज को उदयपुर लेकर आए और पीएमसीएच के यूरोलॉजिस्ट एवं रिकंस्ट्रक्शनल सर्जन डॉ. हनुवन्त सिंह राठौड़ से संपर्क किया।
चिकित्सा जगत में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता आज एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। लेकिन, सही समय पर सटीक निदान, आधुनिक तकनीक और आईसीयू टीम के अथक प्रयासों से मौत के मुंह से भी मरीज को वापस लाया जा सकता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में जहाँ डॉ. चेतन गोयल और डॉ. सुनील कुमार की टीम ने एक 40 वर्षीय मरीज को एक बेहद दुर्लभ और खतरनाक संक्रमण से बचाकर नई जिंदगी दी। मरीज के सफल इलाज में डॉ.इब्राहिम एवं आईसीयू स्टॉफ का भी सहयोग रहा। गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुँचा मरीज : दरअसल 40 वर्षीय मरीज लंबे समय से अनियंत्रित मधुमेह और टी.बी. की बीमारी से पीढित था। मरीज को सांस लेने में गंभीर समस्या एवं गंभीर स्थिति में पीएमसीएच लाया गया. तब बायोफायर टेस्ट ने खोला बीमारी का राज क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ. चेतन गोयल ने बताया कि मरीज के फेफड़ों की गहराई से जाँच करने के लिए ब्रोंकोएल्वियोलर लैवेज प्रक्रिया अपनाई गई। एक डायग्नोस्टिक प्रक्रिया है, जिसमें फेफड़ों के अंदर नमकीन पानी डालकर वापस निकाला जाता है, ताकि वहाँ मौजूद संक्रमण, सूजन या कैंसर कोशिकाओं की जाँच की जा सके और सैंपल को बायोफायर और कल्चर सेंसिटिविटी टेस्ट के लिए भेजा गया। बायोफायर जाँच में वीआरएसए नामक खतरनाक बैक्टीरिया की पुष्टि हुई। यह बैक्टीरिया टिकोप्लानिन और वैन्कोमाइसिन जैसी शक्ति शाली दवाओं के प्रति भी प्रतिरोधी हो चुका था।
पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, भीलों का बेदला के चेस्ट एवं टीबी रोग विभाग के चिकित्सको ने एक 36 वर्षीय युवक के फेफड़े में इंटर कोस्टल ड्रेनेज ट्यूब (आईसीडीटी) की प्रक्रिया सफलता पूर्वक कर उसकी जान बचाई। इस सफल प्रॉसिजर में डॉ. अतुल लुहाडिया के साथ- साथ डॉ. निश्चय, डॉ. अरविंद, डॉ.गोविंद,डॉ. साहिल,डॉ. ड्यू और तकनीशियन लोकेन्द्र, दीपक और नर्सिंग स्टाफ राम प्रसाद एवं बालू का महत्वपूर्ण योगदान रहा। दरअसल घासा, मावली निवासी 36 वर्षीय युवक प्रेम सिंह अपनी बहन को छोड़ने के लिए मावली से डबोक की ओर बाइक से जा रहा था। इसी दौरान डबोक चौराहे पर अचानक एक बैल ने उसे टक्कर मार दी। बैल के सींग लगने से प्रेम सिंह का दायां फेफड़ा फट गया, जिससे पूरे सीने और गले तक हवा भर गई और उसे गंभीर रूप से सांस लेने में तकलीफ होने लगी।